Fir... Aur Fir -- Pustak Samiksha : Atulya Khare




  • Pustak Samiksha : Atulya Khare
  • समीक्षित पुस्तक : फिर और फिर 
  • द्वारा : सुमति सक्सेना लाल
  • सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 


                       

 

शीर्षक :-क्या समय अपने आप को वाकई दोहराता है। एक कशमकश और नारी मन की उलझन,

कि  जो माँ पर लांक्षित था अथवा दीदी के साथ हुआ क्या नियति स्वयं को दोहरा रही है, और अब

 उसके साथ भी वही कुछ घट रहा है। जो कुछ हुआ वह टाला जा सकता था, किन्तु स्थितियां चाहे जो

 भी होतीं जो कुछ हुआ होना ही था, या शायद होना समय ने पहले ही लिख दिया था। जो कुछ गुजरा

 वही पुनः सम्मुख आ खड़ा हुआ तो क्या फिर दोहराव होगा।

घटना क्रम को देखते हुए शीर्षक फिर...और फिर शीर्षक न होकर संपूर्ण वृतांत ही है। सम्पूर्ण कहानी

 पढने के बाद प्रतीत होता है की संभवतः इस उपन्यास हेतु यही शीर्षक सर्वश्रेष्ठ था। शीर्षक  युक्तियुक्त

 है।

 रचनाकार  :- जब कभी भी हिंदी साहित्यि को विशिष्ठ योगदान देने वाले रचनाकारों का ज़िक्र होता

 है, तो उन में अत्यंत वरिष्ट लेखिका सुमति सक्सेना लाल का नाम बहुत ही आदर एवं विशेष उल्लेख

 के साथ लिया जाता है,  आप साहित्य जगत से काफी समय तक दूर रहीं और एक लम्बे विराम के बाद

 जब पुनः वापसी करी तब विभिन्न विशिष्ठ रचनाएँ देकर साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज

 करवा दी। उनकी विभिन्न रचनाएँ तत्कालीन समस्त प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, किन्तु

 

fir aur fir उपन्यास की लेखिका sumati saxena


आपने  उसी दौरान साहित्य को कई  अनमोल संग्रहणीय  रचनाएँ दे कर कृतार्थ किया, यथा कहानी संग्रह

अलग अलग दीवारें” ,” दूसरी   शुरुआत” ,” होने से न होने तक वे लोग “   काफी सराहे गए एवं

 पाठको से भरपूर प्यार बटोर कर अपनी   अमित छाप छोड़ गए वहीं फिर...और फिर “ लेखिका द्वारा

 रचित एक नारी प्रधान ऐसी कृति है जो दो बार   लिखी गयी .पहली बार सामाजिक स्थितियों के मद्देनज़र

 समय से बहुत पूर्व एवं दूसरी बार अपने उपयुक्त समय   पर , जिस पर आगे बिन्दुवार विस्तृत विमर्श

 होगा ।

लेखन शैली:- नारी मन को केन्द्रित सम्पूर्ण कथानक है जिसमें अति सामान्य शैली में एक परिवार के विभिन्न सदस्यों के विषय में, एवं एक नारी का  स्वयं के विषय में जितना भी सहज एवं सरल हो कर लिखा जा सकता है वही उन्होंने किया है एवं चूँकि वे अपने लेखन की शैली से  पाठक के मस्तिष्क को अपने नियंत्रण में करने की कला में  अत्यंत  निपुण हैं सो पाठक का पात्र से जुड़ कर रहना , घटना क्रम हेतु व्यग्रता, अंत जानने हेतु उत्सुकता, आदि  सहज ही दीखते हैं। भाषा के स्तर, शालीनता , एवं वाक्यों की सुन्दरता से कहीं भी कोई समझौता नज़र नहीं आता । 

कथानक के सरल प्रवाह के संग भावनाओं की अभिव्यक्ति हेतु कहीं भी अतिरिक्त आग्रह लक्षित नहीं है।सामान्य भाषा शैली है जो कि आम जन पढ़े , सामाजिक व्यवस्था को समझे , गुने  और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के ही समझ सके।

fir aur fir उपन्यास का front cover

 भाव अपने सरल प्रवाह में ही प्रगट होते है अतः व्यवधान अथवा अतिशय प्रयास  प्रतीत नहीं होता। कथानक में भाव स्पष्टीकरण एवं कथ्य की अंतरात्मा तक पहुचने हेतु कही कही सुंदर वाक्यांशों का भी प्रयोग देखने में आता है यथा:

-सुख का एक पर्दा  था , जो अनायास ही हम दोनों के बीच से सरक जाता है।एक दुसरे के दुखों से नितांत अनभिग्य हम , फिर भी अनजाने में ही एक दुसरे के सामने निरावरण हो उठते हैं।इसा लिए आत्मीय भी।

- हवा के हलके झोंके भर से ढेर ढेर सी महक चारों ओर बिखर जाती है।खिड़की से चारों तरफ झांकता चाँदनी का धुंधला सा साया और पानी में भीगती दूब की सोंधी ठंडक पलंग पर फ़ैल जाती है।त्रस्त  चेतना की घनी परतों के अन्दर उमड़ता घुमड़ता एक नम आवेश सहने की सीमा के पार तक अदमनीय धार सा मुझे चीरता चला जाता है।

कुछ कुछ एकल वाक्य भी गंभीर भाव को दर्शाने हेतु सुन्दरता से प्रयुक्त हुए हैं जैसे की,

-झूठ जो मैंने बोला नहीं पर जिसके सुख को उन्होंने बूँद बूँद पिया है।

-पत्थर के बुत से शेखर और सहनशीलता के अंतिम कगार पर मैं।  

कथानक की मांग पर कहीं कहीं  कुछ आध्यात्मिक विचार भी देखने में आते हैं जो की वैसा ही है जैसे किसी का मन ही मन कुछ कहना , एक बानगी देखिये :

-जब तक सामने का सब कुछ अस्थिर अनिश्चित होता है , तब तक हम उसे अस्वीकार भी करते हैं और उससे विद्रोह कर उसकी दिशाओं को मोड़ने की कोशिश  भी , पर जब वही आगत वर्तमान बन पैरों के नीचे का सच बन जाता है और हमारे सामने जिंदगी का आकार ले लेता है , तब हमारे सारे विद्रोह चुक कर मौन हो जाते हैं और तब हम अपने अंतर की पूरी शक्ति लगा कर अपनी ज़िन्दगी से एक खुशहाल समझौता कर लेना चाहते हैं  

पात्र परिचय:-एक संपन्न परिवार की कुछ महिलाओं पर केन्द्रित कथानक है जिसमें माँ, दो बेटियों के अतिरिक्त कुछ आवश्यक पुरुष पात्र हैं जो स्थिति अनुसार उचित हैं एवं अपनी उपस्थिति से कहीं भी अनावश्यक उपस्थिति का आभास नहीं देते। छुट्टन चाचा के पात्र को तनिक और विस्तार अगर मिल सकता तो संभवतः रोचकता बढ़ जाती। वहीं  सहेलियों के पात्र भी ख़ूबसूरती से गढ़े गए हैं। हर पात्र अनिवार्य है एवं कथानक के साथ पूर्णतः जुड़ा  हुआ है।     

कथानक   :-  मूल कथानक जिस दौर में अस्तित्व में आया लेखिका के अनुसार 1969 में, तब के समय के हिसाब से यह बहुत आगे की बात थी की कोई महिला पतिव्रता सति घरेलु पत्नी की रीत और परंपरा से अलग किसी अन्य पुरुष से  प्रेम करे व  प्रेमी का वरण  करे। संपन्न परिवार में जहाँ  पति को अपने व्यवसाय व राजनीती से फुर्सत नहीं वहां हालाँकि यह कभी स्पष्ट या उजागर नहीं हुआ की माँ का छुट्टन चाचा से क्या सम्बन्ध था, कुछ था भी, या वह महज़ दीदी की नफरत भरी सोच का परिणाम था, या उनके प्यार को मिलवाने में माँ के सहयोग न करने के कारण  उनकी माँ से नाराज़गी का बदला, शायद उसकी सजा उन्होंने स्वयं को ही दी फिर नीलू का किस्सा  अथवा स्वयं की शेखर से जुड़ने की सारी  संभावनाओं एवं प्रेम के बावजूद अन्यत्र विवाह, मुख्यतः नारी की प्रेम पिपासा , दमित कामनाओं  की अवस्था मानसिक उद्वेलन , पारिवारिक रिश्ते , कुछ मज़बूत तो कुछ कमज़ोर कड़ियाँ ,एवं नारी शिक्षा जैसे विभिन्न विषयों के इर्द गिर्द सारे  कथानक का तानाबाना बुना गया है।

एक सवाल भी उठाया है की पति से उपेक्षित रहकर किसी “परपुरुष “ के आकर्षण में बांध जाना क्या सच में उतना बड़ा अपराध था की उसके लिए कभी माफ़ नहीं किया जा सकता।

घटनाक्रम:-

पारिवारिक सम्पन्नता तो है किन्तु कहीं न कहीं माता पिता के प्रति असंतुष्ठी , नफरत के भाव भी हैं।

दीदी के मन में श्री दा जो की उनके बचपन के प्रेम थे से विवाह न होना व ज़ाहिर न करते हुए भी  कुछ अंत तक भी शेष रहा है, जो कि माँ के प्रति उनके मन में नफरत का कारण  बना और वही बीज उन्होंने नायिका के मन में भी बो दिए जबकि छुट्टन चाह्चा का क्या कृत्य था इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं है जबकि मूल कारण  का एक प्रमुख स्तम्भ वही है। वही एक चरित्र है जो खुलकर कहीं भी सामने नहीं है, किन्तु मुख्य समस्या का प्रारंभ उस से ही था। दी के बचपन के प्यार को माँ  ने नहीं समझा या फिर शायद उन्हें पता ही नहीं था। संभवतः दी ने इसी का  बदला लेने के लिए माँ पर झूठा लांक्षन लगाया था।

माँ  का छुट्टन से रिश्ता था या नहीं न मालूम होते हुए भी उनके प्रति एक घृणा का भाव था। और क्या छुटन ने दी के साथ भी कुछ गलत हरकत अंजाम दी थी। उनके आत्महत्या का कारण सदा अज्ञात ही रहा।

माँ के प्रति नफ़रत उसी के नाम पर आई एक उहा-पोह की स्थिति थी कि  बार बार न जाने कितनी बार माँ  की ज़िदगी के वीरानेपन पर तरस आने लगता है पर मैं चाहने पर भी रिश्तों को पहले जैसी शक्ल नहीं दे पाती। लगता है जैसे हर बार मेरे और माँ  के बीच सुप्रिया दी आकर खड़ी हो जाती हैं।



नायिका की मन: स्थिति दिखलाती ये पंक्तियाँ  : कभी कभी बहुत अधिक पछतावा होता है, उस सब के लिए जो मुझे उनके साथ करना चाहिए था पर मैंने नहीं किया। उसके लिए भी जो मैंने उनके साथ किया पर मुझे नहीं करना चाहिए था मम्मी बहुत अभागी थी। हर रिश्ते में उनकी मुट्ठी खुली ही रही। एक बार उनको फिर से पा लेने की तडपन होती है कितने सवाल और कितने मलाल।

माँ पिता के बीच सम्बन्ध सामंजस्य न होना या सम्बन्ध न होना भी एक मुख्य तत्व है एवं शायद यही यदि छुट्टन के उस परिवार में पैठ बनाने का कारण भी था।

नीलू का चरित्र चित्रण भी ख़ूबसूरती से एक जुझारू किन्तु स्वाभिमानी युवती के रूप में किया गया है, जो की दूर के रिश्तेदार की बेटी है और माँ के बहुत करीब है, पहले चाची के भाई से उसकी नजदीकियां रहती हैं, और फिर लड़के की शादी अचानक ही कही और हो जाना उसे तोड़ जाता है, उसके बाद भी नीलू का अपने प्रेमी से सम्बन्ध रखना व समाज के प्रति रोष दिखलाना की “मै क्यू सब के लिए सोचूँ जब किसी ने मेरे लिए नहीं सोचा”। अपना रिश्ता न जुड़ पाने के लिए नीलू सदैव चाची को दोषी मानती रही व शायद दहेज़ प्रथा को भी एवं स्वयं के माध्यम वर्गीय होने को भी।किन्तु बाद में चाची के रहस्योद्घाटन से स्थिति साफ़ हुयी आगे नीलू का स्वयं को सक्षम बना कर बड़ी अधिकारी से शादी कर लेना  उसके स्वाभिमान, नारी शिक्षा की शक्ति दिखलाते हुए समाज के उस वर्ग को ज़बाब है जो शादी के लिए परिवार को उसकी आर्थिक हैसियत से देखते हैं।

वहीं नायिका के बचपन के सहेली के भाई का उसी के कालेज में प्रोफ़ेसर बन कर आना अगला मोड़ है एवं मुख्य कहानी की शरुआत भी। दोनों का परस्पर झुकाव तो है किन्तु खुलकर इज़हार की कमी और बेहद शालीनता से बढती प्रेम बेल का सुन्दर चित्रण है। इसी बीच पिता के परिचित के भाई से नायिका की शादी करा देना एक नया मोड़ लेकर आता है अब यहाँ उनकी मनोदशा देखें की :

-मै गतिविधियों से भरे उस घर में बिलकुल अकेली हो गयी थी।काश मम्मी होती पापा के निर्णय को शायद वे भी बदल नहीं पति शायद बदलना चाहती भी नहीं, पर  वे मुझे इस तरह अकेला न कर देती। क्षण कभी इतने हताश और अँधेरे भी हो सकते हैं मुझे मालूम नहीं था। 


 पति गृह में सम्पन्नता है, सभी तरह से सुखी जीवन हैं किन्तु दिल से पहला प्यार जाता नहीं और पति को दिल से नहीं अपना पाती। कुछ दूरियां बढ़ते बढ़ते अलग होने तक पहुच जाती हैं । पुनः पूर्व प्रेमी से मुलाकाते होने लगती है जिसकी शादी हुयी है नायिका की ही कालेज जी सहेली से। इसी बीच हालात बनते हैं और अब मुलाकात हो जाती है पति के मित्र से जो उस समय जब पति गृह में थी पति का काफी अच्छा मित्र था। और पति के द्वारा छोड़ने पर उसी मित्र की माँ ने संभाला। हालाँकि अब उसकी भी प्रेमिका है किन्तु पुनः प्रेम पल्लवित होने लगता है, की तभी एक नया मोड़ फिर आ जाता है बात आगे खा क्या मोड़ दिखाती है.इस तरह चलती रहती है फिर...और फिर       

समीक्षात्मक टिप्पणी  :-

·        लेखन शैली सरल सहज एवं अद्वितीय है। सम्पूर्ण घटनाक्रम बेहद आसानी से आता जाता है.

·        समय पूर्व इस प्रकार का कथानक अर्थात १९६० के दशक में वाकई एक हिम्मत भरा कदम था ।नारी मन के विभिन्न भावों को एवं नारी की इक्षाओं को खुलकर निरुपित करते हुए भावों का सुन्दर प्रकटीकरण है।

·        माँ का छुट्टन से रिश्ता और दी की आत्महत्या अनसुलझी गुत्थियाँ है जिनपर जानने की उत्सुकता बनी रहती है.

·        सम्पूर्ण लेखन के दौरान भाषा का स्तर अत्यंत उच्च रखा गया है, एवं संस्कारित भाषा पात्रों के मुंह से सुनने को मिलती है .

·        नव युग के लेखकों हेतु उनकी शैली में बहुत कुछ है

निष्कर्ष :-

यूं तो समीक्षात्मक टिप्पण में विषय एवं बिन्दुवार अपने विचार प्रस्तुत कर ही चुका हूँ तथापि, समीक्षाधीन पुस्तक के विषय में निर्विवादित रूप से यह कहा जा सकता है  कि एक बेहद कठिन विषय को , नारी मन की दशा को बेहद सुरुचिपूर्ण सरल एवं सहज तरीके  से बेहद रोचकता संग प्रस्तुत करा गया है।   

 अवश्य ही पढने योग्य कृति है।



fir aur fir उपन्यास samikshak atulya khare                         

यदि आप भी सुमति जी के उपन्यासों में खो जाते हैं, उनकी लेखन शैली के कायल है

तो दिए हुए लिंक आपके लिए हैं ,पहले पुस्तकों की समीक्षा पढ़ें फिर उपन्यासों का आनंद लें


अतुल्य  खरे 

pustak samiksha : Atulya Khare 

 

 

 

 


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